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समुद्री लुटेरों की कैद से छूटे 3 Himachali युवकों की आपबीती: हर दम सिर पर बंदूक, 24 घंटे में एक बार खाना

समुद्री लुटेरों की कैद से छूटे 3 Himachali युवकों की आपबीती:  हर दम सिर पर बंदूक, 24 घंटे में एक बार खाना


समुद्री लुटेरों की ओर से नाइजीरिया में बंधक बनाए कांगड़ा के ग्रुप कैप्टन सुशील धीमान, पंकज और अजय कुमार अपने घर पहुंच गए हैं। घर पहुंचने से पहले सुबह 6:30 बजे तीनों देहरा के बनखंडी स्थित माता बगलामुखी मंदिर पहुंचे और सकुशल घर पहुंचने के लिए पूजा-अर्चना की। घर पहुंचते ही परिवार और आस-पड़ोस वालों ने उनका पटाखे फोड़ और मिठाई बांटकर खुशी का इजहार किया।

माता-पिता, पत्नी और बच्चों की आंखें खुशी में छलक पड़ीं। तीनों युवक बीते दिन नाइजीरिया से दिल्ली पहुंचे थे। शनिवार रात को वे कांगड़ा के लिए निकले थे। घर पहुंचते ही तीनों युवाओं ने आपबीती सुनाई कि उन्हें 71 दिनों तक एक सुनसान जंगल में एक टेंट में रखा गया। रोज उनका मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न होता।

उन्हें 24 घंटे में खाने के लिए केवल एक ही समय थोड़े से नूडल्स मिलते। जिस दिन उन्हें लगता कि फिरौती का पैसा मिल जाएगा, उस दिन दो बार नूडल्स देते। इससे उनकी सेहत और मनोबल गिरता जा रहा था। हर समय सात-आठ लुटेरे उनके सिर पर बंदूक ताने उन्हें मारने की धमकियां देते थे।

अगर शौच के लिए भी जाना हो तो लुटेरे एक बंदूकधारी को साथ भेजते। उन्हें हर पल यह डर सताता था कि पता नहीं गुस्से में आकर लुटेरे कब उन्हें गोली मार दें। उनकी तो उम्मीद टूट गई थी कि घर पहुंचकर कभी परिवार से मिल भी पाएंगे या नहीं।



31 जनवरी को किया था अपहरण, 11 अप्रैल को छोड़ा



सुशील ने बताया कि इन 71 दिनों में लुटेरे जब भी सेटेलाइट फोन से उनके परिवार से बात करवाते तो कुछ समय के लिए उनकी आस बंध जाती, लेकिन फिर खौफ के साये में जीना पड़ता। सुशील ने बताया कि सभी दस्तावेज उन्होंने अपने कब्जे में ले लिए थे।

छोड़ते समय केवल उनके पासपोर्ट ही उनको दिए। सुशील बोले-वह अब अपने ही देश में कोई भी काम या नौकरी करेंगे, कभी विदेश नहीं जाएंगे। सरकार को चाहिए कि युवाओं को भारत में ही इतनी नौकरियां उपलब्ध करवाए कि ऐसी स्थिति से कभी किसी को न गुजरना पड़े।

हमें नहीं पता किसने दी फिरौती



हमें नहीं पता कि किसने फिरौती दी है। हम सही सलामत पहुंच गए यही बड़ी बात है। नाइजीरिया से समुद्री लुटेरों की कैद से घर पहुंचे युवक यही बोल रहे हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र, प्रदेश सरकार के हम आभारी हैं, जिन्होंने दोबारा परिवार वालों से मिलवाया।

पंकज और अजय ने बताया कि 31 जनवरी 2018 को वे अपने शिप से नाइजीरिया के समुद्री क्षेत्र से एक बंदरगाह को माल ले जा रहे थे। अचानक स्पीड वोट से आए कुछ नाइजीरियाई हथियारबंद लोगों ने उनके शिप को रोककर हमें अगवा कर लिया। अफ्रीकी मूल के 11 कर्मचारियों और शिप को छोड़ दिया, लेकिन हमें जंगल में ले गए।

अपहरणकर्ताओं के पास एक सेटेलाइट फोन था, जिससे वे सुशील की उनके परिजनों से फिरौती की बात करवाते थे। पंकज ने बताया कि 11 अप्रैल को जब उन्हें बताया गया कि उन्हें छोड़ा जा रहा है, तब उनकी जान में जान आई। उन्हें छोड़ने के बाद एक बंदरगाह पोर्ट हरकोट में लाया गया, जहां से हमें भारतीय दूतावास ले गए।


घर पहुंचते ही फोड़े पटाखे, मां ने आरती उतार गले लगा लिया सुशील



नाइजीरिया से समुद्री लुटेरों के चंगुल से छूटने के बाद ग्रुप कैप्टन सुशील कुमार घर जाने से पहले मां बगलामुखी के मंदिर गए। सुबह साढ़े छह बजे बनखंडी स्थित माता के मंदिर में पहुंचे और अपने सही सलामत लौटने पर पूजा-अर्चना की। करीब साढ़े सात बजे जैसे ही सुशील अपने छोटे भाई विनय और चचेरे भाई अमित के साथ घर के गेट पर पहुंचे तो वहां परिवार वालों और ग्रामीणों का खुशी का ठिकाना न रहा।

सुशील का आतिशबाजी कर जोरदार स्वागत किया। गेट पर खड़ी उनकी मां आरती उतारी और बेटे को गले लगाया। सुशील की माता, उनके पिता रघुबीर और पत्नी के खुशी में आंसू छलक गए। पापा को देख दोनों बच्चे उनसे लिपट गए। सुशील की आंखें भी छलक गईं। सुशील की घर वापसी के लिए परिवार ने मां ज्वालाजी की अखंड ज्योति जला रखी थी, जिसको नमन कर उन्होंने घर पर मौजूद सभी लोगों का आशीर्वाद लिया।

जवाली के विधायक अर्जुन सिंह ने सुशील को टोपी और शॉल देकर घर वापसी की बधाई दी। इस मौके पर संजय गुलेरिया, बलवीर पठानिया, सुगनाड़ा पंचायत प्रधान हाकम सिंह, उपप्रधान प्रवीण सोनी, संजय उपाध्याय, सुखपाल सिंह गोगी, संजय महाजन, रंजीत गुलेरिया, अश्वनी गुलेरिया, रिशु शर्मा, आनंद साहिल, श्याम स्वरूप शर्मा, धर्मपाल महाजन, प्रेम स्वरूप और नायब तहसीलदार बाल कृष्ण आदि मौजूद रहे।


पंकज को आंगन में देख सुलोचना बोली, आ बेटा लग जा मेरे गले



नाइजीरिया में बंधक बनाया नगरोटा बगवां के रढ गांव का पंकज कुमार जैसे ही अपने घर के आंगन में पहुंचा तो उनकी मां सुलोचना देवी बोलीं- आ गया मेरा बच्चा, लग जा मेरे गले।

सुबह 7.30 बजे जैसे ही पंकज घर पहुंचा तो उसकी मां की आंखों से आंसू निकल गए। उनके चेहरे पर ऐसी खुशी थी मानो उनको बरसों से खोया कोई खजाना मिल गया।

मां के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। घर की दहलीज पर कदम रखते ही पंकज के पिता वेद प्रकाश और बहन प्रियंका की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। घर पर मौजूद सभी लोगों का मुंह मीठा करवा गया और घर के आंगन में स्थित मंदिर में बेटे से विशेष पूजा अर्चना करवाई गई।

पंकज की माता ने बताया कि अपने बेटे के घर आने की खुशी और बेचैनी में वे रात भर नहीं सो पाए। सुबह बेटे के घर पहुंचते ही उन्हें वह सब कुछ मिल गया। बेटे के घर वापस आते ही उसे सुबह नाश्ते में उसकी मनपसंद आलू-बीन्स की सब्जी परोसी गई।

इस मौके पर नगरोटा बगवां के विधायक अरुण कुमार कूका, पूर्व मंत्री जीएस बाली, तहसीलदार मनोज कुमार और उस्तेहड़ पंचायत प्रधान अविनाश उपाध्याय मौजूद रहे।


महिलाओं ने गाए स्वागत गीत


पालमपुर उपमंडल के मलोग का अजय कुमार साढ़े आठ बजे जैसे ही घर पहुंचा तो मांग ने आरती उतारी और महिलाओं ने उसके स्वागत में पहाड़ी गीत गाए। अजय के घर में शादी जैसा माहौल बना हुआ था। लोग खुशी में नाच-गा रहे थे।

अजय के पिता रमेश अंगारिया और माता कमला बेटे को घर पर देख खुशी में लिपट गए। उनकी आंखों में आंसू आ गए। पत्नी, बच्चे और बहन आशा की आंखें भी गमगीन थी। हर कोई मां चामुंडा का शुक्रिया अदा कर रहा था।

अजय को घर छोड़ने के लिए नगरोटा बगवां के विधायक अजय मेहरा कूका साथ आए। स्वास्थ्य मंत्री विपिन सिंह परमार की पत्नी शर्मिला परमार भी अजय को बधाई देने उनके घर पहुंचीं। स्वास्थ्य मंत्री ने अजय को फोन पर बधाई दी। रविवार को घर पहुंचते ही अजय कुमार का जोरदार स्वागत हुआ।

मां चामुंडा से मांगी मन्नत हुई पूरी- अजय की बहन आशा ने कहा कि उन्होंने अपने भाई की रिहाई की मन्नत माता चामुंडा से मांगी थी, जो अब पूरी हो गई है। अब वह भाई और परिजनों के साथ माता चामुंडा जाएंगे।


पुनर्जन्म से कम नहीं घर वापसी- समुद्री लुटेरों की कैद से छूटे नगरोटा बगवां के रढ गांव के पंकज कुमार (26) इसे अपना पुनर्जन्म मान रहे हैं। पंकज का कहना है कि समुद्री डाकुओं के बंधक बनाकर फिरौती की मांग करने के किस्से ही सुने थे।

लेकिन, जब उन्हें ऐसे हालात से गुजरना पड़ा तो महसूस हुआ कि एक बंधक के रूप जीवन कितना कठिन होता है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में पंकज ने आपबीती सुनाई। हालांकि, पंकज ने अभी अपना हौसला नहीं छोड़ा है। उसका कहना है कि वह कोरल रिलीफ शिपिंग कंपनी मुंबई में कार्यरत है। कुछ दिन आराम करने के बाद वह बाद कंपनी को फिर से अपनी सेवाएं देगा।

अभी 67 दिन ही हुए और हो गया अजय का अपहरण- जहाज में इलेक्ट्रिशियन अजय का कहना है उसने 25 नंवबर को मर्चेंट नेवी ज्वाइन की थी और 31 जनवरी को उनका अपहरण हो गया था।

उनकी रिहाई के बढ़ते हुए दिनों से एक समय हम तीनों ने जीने की आस छोड़ दी थी। पैसे न आने पर झुंझलाते हुए लुटेरों उनके सिर पर बंदूक तक तान देते थे। जब भी कोई उदास हो जाता था तो एक-दूसरे का सहारा बनते थे। उन्हें कुछ मालूम नहीं था कि देश-दुनिया में क्या हो रहा है।

Post Source : amarujala.com

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